Diwali festival in hindi language essay

<b>Essay</b> on <b>Diwali</b> in <b>Hindi</b>

Essay on Diwali in Hindi Here is a compilation of Essays on ‘Diwali’ for students of the class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 and 12 as well as for teachers. Get Some Best Essay on Diwali in hindi for students 100, 200, 500, 2000 words। 10 Line Essay on Diwali in Hindi For Class 2,3,4 1 भारत में हिंदू धर्म के लोगों द्वारा बनाया जाने वाला सबसे बड़ा त्यौहार दिवाली है। 2 प्रत्येक वर्ष.

<i>Diwali</i> <i>Essay</i> in <i>Hindi</i> दीपावली पर 5 हिन्दी निबंध

Diwali Essay in Hindi दीपावली पर 5 हिन्दी निबंध Find paragraphs, long and short essays on ‘Diwali’ (Hindu Festival) especially written for Teachers and School Students in Hindi Language.भारत त्यौहारों का देश है, यहाँ समय-समय पर विभिन्न जातियों समुदायों द्वारा अपने-अपने त्यौहार मनाये जाते हैं सभी त्यौहारों में दीपावली सर्वाधिक प्रिय है । दीपों का त्यौहार दीपावली दीवाली जैसे अनेक नामों से पुकारा जाने वाला आनन्द और प्रकाश का त्यौहार है ।यह त्यौहार भारतीय सभ्यता-संस्कृति का एक सर्वप्रमुख त्यौहार है । यह ऋतु परिवर्तन का सूचक है । इसके साथ अनेक धार्मिक मान्यताएँ भी जुड़ी हैं यह उत्साह, उल्लास, भाईचारे, साफ-सफाई तथा पूजा-अर्चना का त्यौहार है । यह त्यौहार प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है ।दीपावली का त्यौहार मनाने की परंपरा कब और क्यों आरंभ हुई कहते हैं: इस दिन अयोध्या के राजा रामचंद्र लंका के अत्याचारी राजा रावण का नाश कर और चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयो ध्या वापस लोटे थे । उनकी विजय और आगमन की खुशी के प्रतीक रूप में अयोध्यावासियों ने नगर को घी के दीपों से प्रकाशित किया था ।प्रसन्नता के सूचक पटाखे और आतिशबाजी का प्रदर्शन कर परस्पर मिठाईयां बांटी थी । उसी दिन का स्मरण करने तथा अज्ञान-अंधकार एवं अन्याय- अत्याचार के विरूद्ध हमेशा संघर्ष करते रहने की चेतना उजागर किए रहने के लिए ही उस दिन से प्रत्येक वर्ष भारतवासी इस दिन दीप जलाकर हार्दिक हर्षोउल्लास प्रकट करते और मिठाईया खिलाकर अपनी प्रसन्नता का आदान प्रदान करते हैं ।इस दिन जैन तीर्थकर भगवान महावीर ने जैतन्य की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए महानिर्वाण प्राप्त किया था । स्वामी दयानंद ने भी इस दिन निर्वाण प्राप्त किया था । सिख संप्रदाय के छठे गुरू हरगोविंदजी को बंदीग्रह से छोड़ा गया था इसलिए लोगों ने दीपमाला सजाई थी ।दीपावली आने तक ऋतु के प्रभाव से वर्षा ऋतु प्राय: समाप्त हो चुकी होती है । मौसम में गुलाबी ठंडक घुलने लगती है आकाश पर खजन पक्षियों की पंक्तिबद्ध टोलिया उड़कर उसकी नील नीरवता को चार चाद लगा दिया करती हैं । राजहंस मानसरोवर में लोट आते हैं नदियों-सरोवरों का जल इस समय तक स्वच्छ और निर्मल हो चुका होता है ।प्रकृति में नया निखार और खुमार आने लगता है । इन सबसे प्रेरणा लेकर लोग-बाग भी अपने-अपने घर साफ बनाकर रंग-रोगन करवाने लगते हैं इस प्रकार प्रकृति उगैर मानव समाज दोनों ही जैसे गंदगी के अंधकार को दूर भगा प्रकाश का पर्व दीपावली मनाने की तैयारी करने लगते हैं यह तैयारी दुकानों-बाजारों की सजावट और रौनक दिखाई देने लगती है ।दीपावली को धूम-धाम से मनाने के लिए हफ्तों पहले तैयारी आरंभ हो जाती है । पांच-छ: दिन पहले फल-मेवों और मिठाइयों की दुकाने सज-धज कर खरीददारों का आकर्षण बन जाती है । मिट्टी के खिलौने दीपक अन्य प्रकार की मूर्तियाँ चित्र बनाने वाले बाजारों में आ जाते हैं ।पटाखे, आतिशबाजी के स्टालों पर खरीददारों की भीड़ लग जाती है । खील, बताशे खिलौने मिठाईयां बनाई व खरीदी जाती हैं इन्हें बेचने के लिए बाजारों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है । दीपावली की रात दीपकों और बिजली के छोटे-बड़े बच्चों से घरों-दुकानों का वातावरण पूरी तरह से जगमगा उठता है ।दीपावली के लिए नए-नए कपड़े सिलाए जाते हैं मिठाई पकवान बनते हैं घर-घर में लक्ष्मी का पूजन शुभ कामनाओं का आदान-प्रदान और मुंह मीठा किया कराया जाता है । व्यापारी लक्ष्मी पूजन के साथ नए बही खाते आरम्भ करते हैं इस प्रकार दीपावली प्रसन्नता और प्रकाश का त्यौहार है । जुआ खेलना, शराब पीना जैसी कुछ कुरीतियाँ भी स्वार्थी लोगों ने इस पवित्र त्यौहार के साथ जोड़ रखी हैं उनमें होने वाले दीवाले से सजग सावधान ही त्यौहार को आनंदपूर्ण बना सकते हैं ।हिन्दू धर्म में यों तो रोजाना कोई न कोई पर्व होता है लेकिन इन पर्वों में मुख्य त्यौहार होली, दशहरा और दीपावली ही हैं । हमारे जीवन में प्रकाश फैलाने वाला दीपावली का त्यौहार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है । इसे ज्योति पर्व या प्रकाश उत्सव भी कहा जाता है ।इस दिन अमावस्या की अंधेरी रात दीपकों व मोमबत्तियों के प्रकाश से जगमगा उठती है । वर्षा ऋतु की समाप्ति के साथ-साथ खेतों में खड़ी धान की फसल भी तैयार हो जाती है । दीपावली का त्यौहार कार्तिक मास की अमावस्या को आता है । इस पर्व की विशेषता यह है कि जिस सप्ताह में यह त्यौहार आता है उसमें पांच त्यौहार होते हैं ।इसी वजह से सप्ताह भर लोगों में उल्लास व उत्साह बना रहता है । दीपावली से पहले धन तेरस पर्व आता है । मान्यता है कि इस दिन कोई-न-कोई नया बर्तन अवश्य खरीदना चाहिए । इस दिन नया बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है । इसके बाद आती है छोटी दीपावली, फिर आती है दीपावली । इसके अगले दिन गोवर्द्धन पूजा तथा अन्त में आता है भैयादूज का त्यौहार ।अन्य त्यौहारों की तरह दीपावली के साथ भी कई धार्मिक तथा ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी हुई हैं । समुद्र-मंथन करने से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक लक्ष्मी भी इसी दिन प्रकट हुई थी । इसके अलावा जैन मत के अनुसार तीर्थंकर महावीर का महानिर्वाण भी इसी दिन हुआ था ।भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुष श्री राम लंका नरेश रावण पर विजय प्राप्त कर सीता लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे थे उनके अयोध्या आगमन पर अयोध्यावासियों ने भगवान श्रीराम के स्वागत के लिए घरों को सजाया व रात्रि में दीपमालिका की ।ऐतिहासिक दृष्टि से इस दिन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं में सिक्खों के छठे गुरु हरगोविन्दसिंह मुगल शासक औरंगजेब की कारागार से मुक्त हुए थे । राजा विक्रमादित्य इसी दिन सिंहासन पर बैठे थे । सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे दीपावली के दिन ही स्वर्ग सिधारे थे । आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द तथा प्रसिद्ध वेदान्ती स्वामी रामतीर्थ जैसे महापुरुषों ने इसी दिन मोक्ष प्राप्त किया था ।यह त्यौहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है । इस दिन लोगों द्वारा दीपों व मोमबत्तियाँ जलाने से हुए प्रकाश से कार्तिक मास की अमावस्या की रात पूर्णिमा की रात में बदल जाती है । इस त्यौहार के आगमन की प्रतीक्षा हर किसी को होती है ।सामान्यजन जहां इस पर्व के आने से माह भर पहले ही घरों की साफ-सफाई, रंग-पुताई में जुट जाते हैं । वहीं व्यापारी तथा दुकानदार भी अपनी-अपनी दुकानें सजाने लगते हैं । इसी त्यौहार से व्यापारी लोग अपने बही-खाते शुरू किया करते हैं । इस दिन बाजार में मेले जैसा माहौल होता है ।बाजार तोरणद्वारों तथा रंग-बिरंगी पताकाओं से सजाये जाते हैं । मिठाई तथा पटाखों की दुकानें खूब सजी होती हैं । इस दिन खील-बताशों तथा मिठाइयों की खूब बिक्री होती है । बच्चे अपनी इच्छानुसार बम, फुलझड़ियां तथा अन्य आतिशबाजी खरीदते हैं ।इस दिन रात्रि के समय लक्ष्मी पूजन होता है । माना जाता है कि इस दिन रात को लक्ष्मी का आगमन होता है । लोग अपने इष्ट-मित्रों के यहां मिठाई का आदान-प्रदान करके दीपावली की शुभकानाएँ लेते-देते हैं । वैज्ञानिक दृष्टि से भी इस त्यौहार का अपना एक अलग महत्व है ।इस दिन छोड़ी जाने वाली आतिशबाजी व घरों में की जाने वाली सफाई से वातावरण में व्याप्त कीटाणु समाप्त हो जाते हैं । मकान और दुकानों की सफाई करने से जहां वातावरण शुद्ध हो जाता है वहीं वह स्वास्थ्यवर्द्धक भी हो जाता है ।कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते हैं व शराब पीते हैं, जोकि मंगलकामना के इस पर्व पर एक तरह का कलंक है । इसके अलावा आतिशबाजी छोड़ने के दौरान हुए हादसों के कारण दुर्घटनाएं हो जाती हैं जिससे धन-जन की हानि होती है । इन बुराइयों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है ।‘तमसो माँ ज्योतिर्गमय’ की वेदोक्ति हमें अन्धकार को छोड़ प्रकाश की ओर बढ़ने की विमल प्रेरणा देती है । अन्धकार अज्ञान तथा प्रकाश ज्ञान का प्रतीक होता है । जब हम अपने अज्ञान रूपी अन्धकार को हटाकर ज्ञान रूपी प्रकाश को प्रज्जलित करते हैं, तो हमे एक असीम व अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है ।दीपावली भी हमारे ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतीक है । अज्ञान रूपी अमावस्या में हम ज्ञान रूपी दीपक जलाकर ससार की सुख व शान्ति की कामना करते हैं । दीपावली का त्यौहार मनाने के पीछे यही आध्यात्मिक रहस्य निहित है ।दीप अवलि से दीपावली शब्द की व्यत्पत्ति होती है । इस त्यौहार के दिन दीपो की अवलि पक्ति बनाकर हम अन्धकार को मिटा देने में जुट जाते हैं । दीपावली का यह पावन पर्व कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है ।गर्मी व वर्षा को विदा कर शरद के स्वागत में यह पर्व मनाया जाता है । उसके बाद शरद चन्द्र की कमनीय कलाएँ सबके चित्त-चकोर को हर्ष विभोर कर देती हैं । शरद पूर्णिमा को ही भगवान् कृष्ण ने महारास लीला का आयोजन किया था ।यह पर्व प्रारम्भ में महालक्ष्मी पूजा के नाम से मनाया जाता था । कार्तिक अमावस्या के दिन समुद्र मथन में महालक्ष्मी का जन्म हुआ । लक्ष्मी धन की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण धन के प्रतीक स्वरूप इसको महालक्ष्मी पूजा के रूप में मनाते आये । आज भी इस दिन घर में महालक्ष्मी की पूजा होती है ।भगवान् राम ने अपने चौदह वर्ष का वनवास समाप्त कर, पापी राबण का वध करके महालक्ष्मी के पुण्य अवसर पर अयोध्या पहुंचने का निश्चय किया, जिसकी सूचना हनुमान द्वारा पहले ही पहुँचा दी गयी ।इसी प्रसन्नता में अयोध्यावासियो ने राम के स्वागतार्थ घर-घर में दीप मालाएँ प्रज्ज्वलित कर दी । महालक्ष्मी की पूजा का यह पर्व तब से राम के अयोध्या आने की खुशी में दीप जलाकर मनाया जाने लगा और यह त्यौहार दीपावली के ही नाम से प्रख्यात हो गया ।दीपावली जहाँ अन्त: करण के ज्ञान का प्रतीक है वही बाह्य स्वच्छता का प्रतीक भी है । घरों में मच्छर, खटमल, पिम्स आदि विषैले किटाणु धीरे-धीरे अपना घर बना लेते हैं । मकड़ी के जाले लग जाते हैं, इसलिये दीपावली से कई दिन पहले से ही घरो की लिपाई-पोताई-सफेदी हो जाती है । सारे घर को चमका कर स्वच्छ किया जाता है । लोग अपनी परिस्थिति के अनुकूल घरों को विभिन्न प्रकारेण सजाते हैं ।दीपावली जैसा कि उसके नाम से ही ज्ञात होता है, घरो में दीपों की पंक्ति बना कर जलाने की परम्परा है । वास्तव में प्राचीन काल से इस त्यौहार को इसी तरह मनाते आये हैं । लोग अपने मकानों की मुण्डेरो में, प्रागण की दीवालों में, दीपो की पंक्ति बनाकर जलाते हैं । मिट्टी के छोटे-छोटे दीपो में तेल, बाती, रख कर उन्हें पहले से पंक्तिबद्ध रखा जाता है ।आजकल मोमबत्तियाँ लाईन बनाकर जलाई जाती हैं । दीपावली के दिन नवीन व स्वच्छ वस्त्र पहनने की परम्परा भी है । लोग दिन भर बाजार से नवीन वस्त्र, बर्तन, मिठाई, फल आदि खरीदते हैं । दुकाने बड़े आकर्षक ढंग से सजी रहती हैं ।बाजारो, दुकानो की सजावट तो देखते ही बनती है । लोग घर पर मिठाई लाते हैं और उसे अपने मित्रो व सगे-सम्बन्धियों में वितरित करते हैं । घर में भी विविध प्रकार के पकवान पकाये जाते हैं ।किसी अच्छे उद्देश्य को लेकर बने त्यौहारो में भी कालान्तर में विकार पैदा हो जाते हैं । जिस लक्ष्मी की पूजा लोग धन-धान्य प्राप्ति हेतू बड़ी श्रद्धा से करते थे, उसकी पूजा कई लोग अज्ञानतावश रुपयों का खेल खेलने के लिये जुए के द्वारा भी करते हैं ।जुआ खेलना एक प्रथा है जो समाज व पावन पर्सों के लिये कलंक है । इसके अतिरिक्त आधुनिक युग में बम पटाखों के प्रयोग से भी कई दुष्परिणाम सामने आते हैं । निबन्ध ।दीपावली का पर्व सभी पर्वो में एक विशिष्ट स्थान रखता है । हमे अपने पवाँ की परम्पराओ को हर स्थिति में सुरक्षित रखना चाहिए । परम्पराएँ हमे उसके प्रारम्भ व उद्देश्य की याद दिलाती हैं । परम्पराएँ हमें उस पर्व के आदि काल में पहुँचा देती हैं, जहाँ हमे अपनी आदिकालीन सस्कृति का ज्ञान होता है ।आज हम अपने त्यौहारों को भी आधुनिक सभ्यता का रग देकर मनाते हैं, परन्तु इससे हमे उसके आदि स्वरूप को बिगाड़ना नहीं चाहिए । हम सबका कर्त्तव्य है कि हम अपने पवाँ की पवित्रता को बनाये रखे ।दीपावली हिन्दुओं का महत्वपूर्ण त्यौहार है । सम्पूर्ण भारत में यह अति उत्साह के साथ मनाया जाता है । इस त्यौहार के साथ बहुत-सी जनश्रुतियाँ एवं दंत कथायें जुड़ी हैं । यह भगवान राम की रावण पर विजय की प्रतीक है । वस्तुत: यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय को प्रमाणित करता है ।दीपावली के दिन पूरे देश में उत्तेजना का वातावरण होता है । लोग अपने सगे सम्बन्धियों को आमन्त्रित करते है । इस त्यौहार पर मिठाइयाँ बनाई जाती हैं एवं मित्रों व रिश्तेदारों में उनका आदान-प्रदान किया जाता है । लोग दीपावली के दिन आमोद-प्रमोद में व्यस्त रहते हैं ।अमीर-गरीब बाल-वृद्ध सभी नये कपड़े पहनते हैं । बच्चे और वृद्ध अपनी सबसे अच्छी चमकीली पोशाक धारण करते हैं । इसी तरह रात को पटाखे और आतिशबाजी की जाती है । मधेरी रात में आतिशबाजी एक मनोहर दृश्य बनाती है ।चारों ओर बहुत खूबसूरत नजारा होता है । सभी अच्छे कपड़ों में उल्लास में व्यस्त रहते हैं । कुछ लोग त्यौहार को बहुत उमग और उत्साह से मनाते हैं तो कुछ लोग जुआ खेलते हैं । जुआरियों के लिये जुआ दीपावली का एक हिस्सा है और उनके अनुसार जो भी इस दिन जुआ नहीं खेलता अगले जन्म में गधा बनता है ।रात्रि में लोग अपने घरों को सजाते हैं । तरह-तरह से रोशनी करते हैं, मोमबत्तियाँ जलाते हैं, दिये जलाते हैं एवं लड़ियाँ लगाते हैं । वह खाते-पीते मौज मनाते हैं व पटाखे जलाते हैं । सारा शहर रोशनी और पटाखों की आवाज में डूब जाता है ।घरों के अतिरिक्त सार्वजनिक इमारतें एवं सरकारी कार्यालयों पर भी रोशनी की जाती है । उस साय का दृश्य बहुत मनोहर होता है । बहुत से हिन्दु दीपावली मनाने से पूर्व गणपति सरस्वती व लक्ष्मी की पूजा करते हैं । हिन्दु इस दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं । वह धन की देवी से प्रार्थना करते हैं वह उनके घर पर कृपा करे ।दीपावली सम्पूर्ण देश का त्यौहार है । यह देश के प्रत्येक हिस्से में मनाया जाता है । इस तरह यह लोगों में एकता की भावना को बलवती करता है । भारत में यह त्यौहार हजारों वर्षों से मनाया जा रहा है एवं आज भी उतने धूमधाम से मनाया जाता है । सभी भारतीयों का यह प्रिय त्यौहार है ।दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक-पर्व है । यह हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है । इसे प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है । दीपावली एक ऐसा पर्व है जिसके आगे-पीछे कई पर्व मनाए जाते हैं । धनतेरस से इस पर्व का आरंभ होता है और लोग लक्ष्मी, गणेश, बरतन तथा पूजा की सामग्री खरीदते हैं ।धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती के रूप में भी मनाया जाता है । धन्वन्तरि वैद्यों के शिरोमणि थे । धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी होती है । इस दिन व्यापक रूप से सफाई की जाती है तथा भगवती लक्ष्मी के आगमन के लिए घर-बाहर काफी सजावट की जाती है । इसे छोटी दीपावली कहने का भी गौरव प्राप्त है ।इस दिन घर में आसपास सरसों के तेल के दीये जलाकर रखे जाते हैं तथा दूसरे दिन भगवती लक्ष्मी के आह्वान के लिए स्तुति व पूजन किया जाता है । धनतेरस, नरक चतुर्दशी के पश्चात् चिर प्रतीक्षित दीपावली का महापर्व आता है । प्रात: काल से ही दीपावली के पूजन तथा घरों को सजाने-संवारने का काम शुरू होता है । कुछ लोग दीपावली के दिन रात 12 बजे भी भगवती लक्ष्मी की पूजा करते हैं ।दीपावली के पर्व की शुरुआत कब से हुई इसके विषय में अनेक कथाएं हैं जिनमें सबसे ज्यादा प्रचलित तथा मानने योग्य कथा यह है कि रावण का वध करने के उपरान्त जब भगवान राम अयोध्या वापस आए थे तो लोगों ने उनके स्वागत के लिए घर-बाहर सभी जगह दीपक जलाए थे ।दीपक जलाने का रिवाज तभी से चला आ रहा है । इस अवसर पर श्रीराम की पूजा करने का विधान होना चाहिए था लेकिन आजकल लोग लक्ष्मी, गणेश की पूजा करते हैं । हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी समृद्धि तथा धन-सम्पत्ति की देवी हैं । भगवान गणेश की भी यही विशेषता है ।दीपावली के त्योहार में जहां अनेक गुण हैं वहीं इस त्योहार के कुछ दुर्गुण भी हैं दीपावली खर्चीला त्योहार है । कुछ लोग कर्ज लेकर भी इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं । नए कपड़े पहनते हैं, कार्ड भेजते हैं तथा डटकर मिठाई छकते हैं । नतीजा यह होता है कि यदि त्योहार महीने के बीच या महीने के शुरू में पड़ता है तो आम नागरिक को पूरा महीना आर्थिक दिक्कतों से काटना पड़ता है ।इस प्रकार यह त्योहार आम लोगों के लिए सुखकारी होने की जगह दु:ख (ऋण) कारी सिद्ध होता है । दीपावली पर्व के विषय में एक आम धारणा यह भी है कि इस त्योहार के लिए जुआ खेलने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं तथा वर्ष-भर धन आता रहता है ।कितना बड़ा अंधविश्वास लागों के मन में समाया हुआ है । इस अंधविश्वास के कारण लक्ष्मी और गणेश पूजन का यह महापर्व लोगों के आकस्मिक संकट का कारण बन जाता है । कुछ लोग जुए में अपना सर्वस्व एक ही रात में गंवा बैठते हैं ।समय तथा परिस्थितियों के कारण इस पर्व के मनाने में जो तमाम पैसा पटाखों, फुलझड़ियों में बरबाद किया जाता है, वह रोका जाना चाहिए । इससे हमारा पैसा तो आग के सुपुर्द होता ही है, इसके साथ-साथकभी-कभी ऐसी दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं जो जीवनभर के लिए व्यक्ति को अपंग बना देती हैं ।1. 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<strong>Diwali</strong> <strong>Essay</strong> in <strong>Hindi</strong>

Diwali Essay in Hindi दीपावली का महत्त्व ।कार्तिक अमावस्या की रात में जब हजारों लाखों दीपक एक साथ जल उठते हैं और एक ज्योति से सहस्त्रों को ज्योर्तिमय बना देने वाले ये दीपक मानो कह उठते हैं: जलो और प्रखरता से जलो, जलते रहो, स्नेह इसमें अभी भरा हुआ है । बाती बहुत लम्बी है ।झरोखे, मुंडेरों और घर के प्रत्येक द्वार पर सजे ये दीपक प्रकाश माला से अभिनन्दन करते हैं, उन सभी स्नेहीजनों और शुभचिन्तकों का, जिनके प्रति हमारे हृदय में शुभकामनाएं हैं, जिनकी अभिव्यक्ति, अपने प्रकाश और उसके भाव तरंगों से करते हुए ये दीपक आलोक पर्व दीपावली की सार्थकता को सिद्ध करते हैं ।‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का सन्देश देता अमावस्या की रात्रि में जलता हुआ, टिमटिमाता हुआ दीपक अन्धकार से संघर्ष करता है । उसे यह ख्याल नहीं आता कि पृथ्वी पर इतना गहन अन्धकार है, मैं अकेला इसे कैसे दूर भगाऊंगा ।वह जलता रहता है, इसी आत्मप्रेरणा से । जलना उसका जीवन है, जलकर प्रकाश देना, बड़ी उसका प्रयोजन है । उसका जीवन मूल्य भी । मानव मन को प्रेरणा देता वह दीपक अज्ञान तिमिर का नाश करके ज्ञान के ज्योतिर्मय प्रकाश को सर्वत्र आलोकित करने का सन्देश भरता है । काली कलूटी अमावस्या की रात प्रकाश में नहाकर शुचिता का सन्देश लाती है । ऐसी शुचिता या स्वच्छता, जो केवल वातावरण की नहीं, शरीर-मन और आचरण से भी जुड़ी हुई है ।बरसात के चार महीनों में धीरे-धीरे जमी हुई गन्दगी, जो दीपावली के दिनों में ही साफ होती है, घरों के आसपास बरसाती पानी और कीचड़ से इकट्‌ठी हुई गन्दगी, जब लिपाई-पोताई से बाहर आ जाती है और जब सभी प्रकार की आन्तरिक कलुषताओं का निष्कासन होता है, तो उस साफ, सुन्दर, स्वच्छ स्थान पर विराजमान होती हैं लक्ष्मी देवी ।कहा भी जाता रहा है कि लक्ष्मी देवी इस दिन भ्रमण करते हुए जिस भी स्थान को स्वच्छ, सुन्दर व आकर्षक देखती हैं, वहीं निवास करती हैं । गन्दे, मलिन स्थानों की ओर वह ताकती भी नहीं । यह सत्य है कि समृद्धि और सम्पन्नता का वास स्वच्छ स्थानों पर होता है । प्रतीकात्मक रूप से हमारे देश में समाज में व्याप्त दरिद्रता का कारण बाहरी वातावरण में व्याप्त वह गन्दगी है, जो घुस आयी है हमारे शरीर में ।मानस में विकृतियों के रूप में, असत्य कपटाचरण, भ्रष्टाचार की वह गन्दगी, जो हमें श्रीहीनअकर्मण्य बना रही है । यदि हमारा शरीर स्वच्छ नहीं, तो स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ेगा ही, रोग उत्पन्न होंगे, शरीर आलस्य व प्रमाद से भरा होगा, क्रियाशीलता का अभाव होगा, कुछ मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होंगे । दीपावली में की जाने वाली स्वच्छता का महत्त्व आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार से है । नरकासुर के मारे जाने का अर्थ गन्दगी के असुर के मारे जाने से है ।दीपावली पर्व का सम्बन्ध कई पौराणिक, ऐतिहासिक गाथाओं से है । पौराणिक कथा के अनुसार जब राजा बलि ने अन्य देवताओं के साथ-साथ लक्ष्मीजी को भी बंदी बना लिया था, तब भगवान् विष्णु ने वामन का रूप धारण कर इसी दिन लक्ष्मीजी को छुड़वाया था । नरकासुर इसी दिन मारा गया था ।लंकापति रावण को मारकर जब भगवान् राम 14 वर्षों के वनवास की अवधि पूरी कर लक्ष्मणजी, सीताजी सहित अयोध्यापुरी पहुंचे थे, तब अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था । इसी दिन राज्याभिषेक होने पर अयोध्यावासियों ने दीपकोत्सव मनाकर रामजी का अभिनन्दन किया था ।सरस्वती और स्वामी रामतीर्थ ने अपने पवित्र शरीर का त्याग किया और सहस्त्रों मनुष्यों को ज्ञान का प्रकाश दिया । आज से लगभग ढाई हजार पूर्व में पावापुरी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था ।उस अंधेरी रात में सुर, मनुष्य, नाग, गन्धर्व ने रत्नों के दीपक जलाये । इस दिन ब्रह्ममुहूर्त में बुद्ध के प्रमुख शिष्य इन्द्राभूति गौतम ने ज्ञान लक्ष्मी प्राप्त की थी । दीपावली पर्व वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि दीपक के प्रकाश से वातावरण की वायु शुद्ध हो जाती है, वर्षा के प्रभाव से बीमारी फैलाने वाले कीटाणु कीट-पतंगे जलकर मर जाते हैं ।दीपावली हमारे लिए कर्मठता और जागरूकता का सन्देश भी लाती है । शास्त्रों के अनुसार-जो व्यक्ति लक्ष्मीजी का पूजन नहीं करता, आलस्य व प्रमाद में रमा रहता है, उसके घर लक्ष्मी नहीं आतीं । लक्ष्मी के वास के लिए जहां आन्तरिक, बाह्य शुद्धता का महत्त्व है. Long and Short Essay on Diwali in Hindi निबंध 1 300 शब्द

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<strong>Diwali</strong> <strong>Essay</strong> in <strong>Hindi</strong> - दीवालीदीपावली पर निबंध

Diwali Essay in Hindi - दीवालीदीपावली पर निबंध 2) Deepawali is the five day festival which starts with Dhanteras; on which day people clean their homes and shop for gold and other utensils. Diwali Essay in Hindi अर्थात इस article में हम पढेंगे, दीवाली दीपावली पर एक नहीं बल्कि दो-दो निबंध हिन्दी में, दोनों दीपावली 2019 के निबंध नुक्ते बनाकर दिए गए हैं.

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